उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा परिचर्या) नियमावली 2011 (यथासंशोधित 2014, 2016 एवं 2021)
संविधान के अनुच्छेद 309 के परन्तुक द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करके और इस विषय पर विद्यमान समस्त नियमों और आदेशों का अधिक्रमण करके राज्यपाल निम्नलिखित नियमावली बनाते हैं:
भाग-एक : सामान्य
1- संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ
(1) यह नियमावली उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा परिचर्या) नियमावली, 2011 कही जायेगी।
(2) यह तुरन्त प्रवृत्त होगी।
2- प्रयोज्यता
यह नियमावली निम्नलिखित पर लागू होगी—
(क) सभी सरकारी सेवक, जबकि वे कार्य पर हों या अवकाश पर हों या निलम्बन के अधीन हों, और उनके परिवार;
(ख) सेवानिवृत्त सरकारी सेवक और उनके परिवार तथा मृत सरकारी सेवकों के मामले में उनके परिवार के ऐसे सदस्य, जो पारिवारिक पेंशन के लिए पात्र हों।
3- परिभाषाएँ
जब तक कि संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो, इस नियमावली में—
(क) “प्राधिकृत चिकित्सा परिचारक” का तात्पर्य किसी सरकारी चिकित्सालय के ऐसे चिकित्सा अधिकारियों या विशेषज्ञों से अथवा संदर्भकर्ता संस्थाओं के ऐसे प्रवक्ताओं, उपाचार्यों, आचार्यों या अन्य विशेषज्ञों से है, जो किसी लाभार्थी को चिकित्सा परिचर्या और उपचार उपलब्ध कराने के लिए सरकार के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा प्रतिनियुक्त हों;
(ख) “लाभार्थी” का तात्पर्य सरकारी सेवक और उनके परिवार, सेवानिवृत्त सरकारी सेवक और उनके परिवार तथा मृत सरकारी सेवकों के मामले में उनके परिवार के ऐसे सदस्यों से है, जो पारिवारिक पेंशन के लिए पात्र हों;
(ग) “परिषद” का तात्पर्य यथाविहित कृत्यों के निर्वहन हेतु सरकार द्वारा जिला, मण्डल और राज्य स्तर पर गठित चिकित्सा परिषद से है;
(ग-1) “सी.जी.एच.एस.” का तात्पर्य केन्द्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना से है;
(ग-2) “आकस्मिक/अप्रत्याशित रोग” का तात्पर्य ऐसे रोगों से है, जो कि परिशिष्ट “ङ” में उल्लिखित हैं;
(घ) “निदेशक” का तात्पर्य निदेशक, (चिकित्सा परिचर्या) चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा निदेशालय, उत्तर प्रदेश से है;
(ङ) “महानिदेशक” का तात्पर्य महानिदेशक, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाएँ, उत्तर प्रदेश से है;
(च) “परिवार” का तात्पर्य—
(एक) सेवा के सदस्य का, यथास्थिति, पति या पत्नी; और
(दो) माता-पिता, बच्चे, सौतेले बच्चे, अविवाहित/तलाकशुदा/परित्यक्त पुत्री, अविवाहित/तलाकशुदा/परित्यक्त बहनें, अवयस्क भाई और सौतेली माता से है,जो सरकारी सेवक पर पूर्णतः आश्रित हैं और सामान्यतया सरकारी सेवक के साथ निवास कर रहे हैं।
टिप्पणी-1 किसी परिवार के ऐसे सदस्यों, जिसकी उपचार आरम्भ होने के समय पर सभी स्रोतों से आय रू0-3500/- और रू0-3500/- प्रतिमाह की मूल पेंशन पर अनुमन्य महँगाई के योग से अधिक न हो, को पूर्णतया आश्रित माना जाएगा।
टिप्पणी-2 आश्रितों के लिए आयु-सीमा निम्नवत होगी:—
(1) पुत्र—सेवायोजित हो जाने या 25 वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने या विवाहित हो जाने तक, जो भी पहले हो।
(2) पुत्री—सेवायोजित हो जाने या विवाहित हो जाने तक, जो भी पहले हो;
(3) ऐसा पुत्र, जो मानसिक या शारीरिक स्थायी निःशक्तता से ग्रस्त हो—जीवनपर्यन्त
(4) तलाकशुदा/पति से परित्याजित/विधवा आश्रित पुत्रियाँ और अविवाहित/तलाकशुदा/पति से परित्याजित विधवा आश्रित बहनें—जीवनपर्यन्त
(5) अवयस्क भाई—वयस्कता प्राप्त करने तक।
(छ) “सरकार” का तात्पर्य उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार से है;
(ज) “राज्यपाल” का तात्पर्य उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से है;
(झ) “सरकारी चिकित्सालय” का तात्पर्य चिकित्सा विश्वविद्यालय/चिकित्सा महाविद्यालय/चिकित्सा संस्थान/स्वशासी सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय से सम्बद्ध किसी चिकित्सालय और किसी सरकारी चिकित्सालय से है।
(ञ) “सरकारी सेवक” का तात्पर्य फाइनेन्शियल हैण्डबुक में यथापरिभाषित ऐसे पूर्णकालिक सरकारी सेवकों, जिसमें अखिल भारतीय सेवा के सदस्य भी हैं, से है जिनका वेतन राज्य के राजस्व से वहन किया जाता है, किन्तु इसमें अंशकालिक कर्मचारी, मौसमी/संविदागत कर्मकार या दैनिक मजदूरी पर लगे कर्मकार सम्मिलित नहीं हैं,
(ञ-1) “स्वास्थ्य कार्ड” का तात्पर्य सरकारी कर्मचारियों/पेंशनरों और उनके आश्रितों को बेनकदी चिकित्सा उपचार हेतु जारी किये गये कार्ड से है;
(ट) “चिकित्सालय” का तात्पर्य एलोपैथिक या होम्योपैथी चिकित्सालय या भारतीय चिकित्सा पद्धति की डिस्पेंसरी या स्वास्थ्य जाँच और चिकित्सीय अन्वेषण हेतु प्रयोगशाला एवं केन्द्र से है,
(ट-1) “असाध्य रोग” का तात्पर्य परिशिष्ट “च” में उल्लिखित रोगों से है;
(ठ) “चिकित्सा परिचर्या” का तात्पर्य रोग निदान और उपचार के प्रयोजनार्थ ऐसे चिकित्सीय परामर्श और परीक्षण एवं अन्वेषण की विधियों से है, जो उपचारी चिकित्सक द्वारा आवश्यक समझी जाएँ,
(ड) “चिकित्सा महाविद्यालय” का तात्पर्य सरकार के प्रशासकीय नियंत्रण के अधीन किसी चिकित्सा पद्धति के चिकित्सा महाविद्यालय से है,
(ढ) “सेवानिवृत्त सरकारी सेवक” का तात्पर्य किसी सरकारी सेवक से है जो सेवा से निवृत्त हो गया हो और सरकार से पेंशन आहरित कर रहा हो। तथापि, इसमें वे सरकारी सेवक सम्मिलित नहीं हैं जो राज्य सरकार की सेवा छोड़ने के पश्चात् किसी स्वशासी संस्था/उपक्रम/निगम आदि में आमेलित हो गये हों,
(ण) “संदर्भित करने वाली संस्था” का तात्पर्य सभी राजकीय चिकित्सालय महाविद्यालय, छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय (सी.एस.एम.एम.यू.), लखनऊ, संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान (एस.जी.पी.जी.आई.एम.एस.), लखनऊ, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ, ग्रामीण आयुर्विज्ञान एवं अनुसंधान संस्थान, सैफई, इटावा इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, वाराणसी (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय), जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय, (अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय), अलीगढ़ और सरकार द्वारा इस रूप में अधिसूचित किसी अन्य संस्था से है,
(त) “राज्य” का तात्पर्य उत्तर प्रदेश राज्य से है,
(थ) “उपचारी चिकित्सक” का तात्पर्य आयुर्विज्ञान की किसी पद्धति के यथाविहित अर्हतायुक्त चिकित्सक से है, जो लाभार्थी का वास्तव में उपचार करता है,
(द) “उपचार” का तात्पर्य सभी उपभोग्य कन्ज्यूमेबल एवं उपभोग पश्चात् त्याज्य डिस्पोजेबल, चिकित्सीय एवं शल्य सुविधाओं के उपयोग और परीक्षण की विधियों और निदान के प्रयोजनार्थ अन्वेषण से है और इसमें अंग प्रत्यारोपण, औषधियाँ, सेरा, वैक्सीन, अन्य थेराप्यूटिक सामग्रियों की आपूर्ति, विहित जीवन-रक्षक प्रक्रियाएँ या चिकित्सालय में भर्ती होना और देखरेख भी सम्मिलित है,
(ध) “बेनकदी उपचार सुविधा” का तात्पर्य चिकित्सा विश्वविद्यालय/चिकित्सा महाविद्यालय/चिकित्सा संस्थान/स्वशासी सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय और किसी सरकारी चिकित्सालय से सम्बद्ध चिकित्सालयों में किसी वित्तीय सीमा के बिना सरकारी कर्मचारियों/पेन्शनरों और उनके आश्रितों के बेनकदी उपचार और आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अधीन पैनलकृत निजी चिकित्सालयों में उक्त योजना के अधीन परिभाषित वित्तीय सीमा तक बेनकदी उपचार से है।
भाग-दो: सरकारी चिकित्सालयों और चिकित्सा महाविद्यालयों/संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान/छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय में उपचार
4- निःशुल्क/बेनकदी चिकित्सा सेवाओं की हकदारी
समस्त लाभार्थी चिकित्सा विश्वविद्यालय/चिकित्सा महाविद्यालय/चिकित्सा संस्थान/स्वशासी सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय से सम्बद्ध चिकित्सालयों और किसी सरकारी चिकित्सालय में अथवा आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अधीन पैनलबद्ध निजी चिकित्सालयों में बेनकदी उपचार के हकदार होंगे। सामान्यतः यह सुविधा लाभार्थी के निवास या तैनाती के स्थान पर उपलब्ध करायी जायेगी। चिकित्सा परिचर्या और उपचार के लिए पंजीकरण फीस और अन्य विहित फीस की प्रतिपूर्ति पूर्णतया सरकार द्वारा की जायेगी। अतिआवश्यक/आपात स्थितियों में एम्बुलेन्स भी निःशुल्क उपलब्ध करायी जायेगी, यदि परिस्थितियों के अनुसार इस प्रकार अपेक्षित हो।
5-संदर्भ अपेक्षित न होना
किसी सरकारी चिकित्सालय या चिकित्सा महाविद्यालय में चिकित्सा परिचर्या और उपचार के लिए प्राधिकृत चिकित्सा परिचारक से किसी संदर्भ की आवश्यकता न होगी।
6-स्वास्थ्य पत्र और हेल्थ कार्ड द्वारा पहचान
(क) किसी लाभार्थी को किसी सरकारी चिकित्सालय या सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय में नि:शुल्क चिकित्सा उपचार तभी उपलब्ध होगा जब वह स्वास्थ्य कार्ड या परिशिष्ट-क में दिये गये प्रारूप पर कार्यालयाध्यक्ष के हस्ताक्षर एवं मुहर से निर्गत स्वास्थ्य कार्ड अथवा किसी संख्यांकित स्वास्थ्य पत्र के माध्यम से अपनी पहचान का प्रमाण प्रस्तुत करेगा/करेगी। स्वास्थ्य पत्र पर लगे फोटो पर कार्यालय की मुहर इस प्रकार लगायी जायेगी कि वह फोटो और पत्र को आंशिक रूप से आच्छादित करे ;
परन्तु यह कि किसी पेंशनभोगी व्यक्ति के लिए उसका पदनाम, तैनाती का स्थान, मूल वेतन और वेतनमान, उसकी सेवानिवृत्ति/मृत्यु से पूर्व उसकी अंतिम तैनाती के अनुसार होगा, किन्तु स्वास्थ्य पत्र उसके द्वारा पेंशन आहरित किये जाने या निवास करने के स्थान पर स्थित उसके सेवा के विभाग के कार्यालयाध्यक्ष द्वारा निर्गत किया जायेगा।
(ख) कार्ड में अपेक्षित किसी विवरण का न होना उसे अविधिमान्य बना देगा। तथापि, यदि परिवार के किन्हीं सदस्यों के बारे में कोई विवरण छूटा हो तो केवल वही सदस्य अपात्र होंगे और वह पत्र शेष लाभार्थियों के लिये विधिमान्य होगा।
(ग) लाभार्थियों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालयों में आकस्मिक/अप्रत्याशित रोगों के नि:शुल्क चिकित्सा उपचार एवं सी.जी.एच.एस. दर पर असाध्य रोगों का चिकित्सा उपचार प्राप्त करने हेतु स्वास्थ्य कार्ड प्रस्तुत करें।
7-वास सुविधा
(क) किसी सरकारी चिकित्सालय या चिकित्सा महाविद्यालय या प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालय में अंतरंग उपचार के मामले में सभी लाभार्थियों को निम्नलिखित वास सुविधा निःशुल्क उपलब्ध कराई जायेगी:-
| क्रमांक | मूल वेतन+ग्रेड वेतन | वार्ड जिनके लिये लाभार्थी हकदार होगा। |
| 1. | रू0-19000/- या अधिक | निजी या विशेष वार्ड |
| 2. | रू0-13000/- से अधिक और रू0-19000/- से कम | सशुल्क वार्ड |
| 3. | रू0-13000/- या कम | सामान्य वार्ड |
परन्तु यह कि किसी पेंशनभोगी द्वारा आहरित अंतिम मूल वेतन को हकदारी के अवधारण के लिए मूल वेतन माना जायेगा तथापि कोई पेंशनभोगी ऐसी सेवाओं से अनिम्नतर सेवाओं के लिए हकदार होगा जोकि वह अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक पूर्व पाता रहा है :
परन्तु अग्रतर यह भी कि किसी लाभार्थी के अनुरोध पर उसकी वास्तविक हकदारी से बेहतर वास सुविधाएं उपलब्ध कराये जाने की दशा में उसको अतिरिक्त व्यय स्वयं वहन करना होगा।
टिप्पणी: प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालयों में अंतरंग उपचार हेतु वार्ड की हकदारी के लिये मानदण्ड, मूल वेतन + ग्रेड वेतन की सीमाओं पर आधारित होंगे जैसा कि ऐसे चिकित्सालयों में भारत सरकार की सी०जी०एच०एस० दरों के अधीन आच्छादित सरकारी सेवकों पर लागू है।
(ख) चिकित्सा अवधि में रोगी को आहार शुल्क अनुमन्य होगा किन्तु यह सम्बन्धित सरकारी चिकित्सालय में तत्समय प्रयोज्य शुल्क से अधिक नहीं होगा।
8-अन्य स्रोतों से औषधियों आदि की आपूर्ति
किसी लाभार्थी के उपचार के लिए औषधियाँ, यथा सेरा, वैक्सीन, रक्त, अन्य थेराप्यूटिक सामग्रियों की आपूर्ति या चिकित्सीय अन्वेषण यथा सोनोग्राफी, कम्प्यूटराइज्ड एक्सियल टोमोग्राफी स्कैनिंग, एन्डोस्कोपी, एन्जियोग्राफी, रेडियोलॉजिकल, पैथोलॉजिकल और बैक्टीरियोलॉजिकल जाँच या कोई अन्य जाँच, जो आवश्यक समझी जाय, अन्य सरकारी या निजी स्रोतों से उपलब्ध कराई जायेगी, यदि, उपचारी चिकित्सक द्वारा लिखित में यह प्रमाणित करते हुए कि ऐसी औषधियाँ या सुविधाएँ सरकारी चिकित्सालय या चिकित्सा महाविद्यालय में उपलब्ध नहीं हैं, ऐसा अवधारित और विहित किया जाय। किसी मधुमेह रोगी के मामले में, जिसे एक दिन में एक से अधिक बार इन्सुलिन विहित किया गया हो, डायग्नॉसिस किट(निदान यंत्र) की लागत, प्राधिकृत चिकित्सा परिचारक की सलाह पर अनुमन्य होगी :
प्रतिबन्ध यह है कि प्राधिकृत चिकित्सा परिचारक या उपचारी चिकित्सक द्वारा ऐसी खर्चीली दवाइयाँ, जिनके लिए कम लागत की किन्तु समान थेराप्यूटिक महत्व की औषधियाँ उपलब्ध हों या ऐसी दवाइयाँ जो खाद्य वस्तुओं, टानिक, प्रसाधन के रूप में प्रयुक्त हों या एंटीसेप्टिक या निजी रक्त बैंक से रक्त के लिए सामान्य रूप से परामर्शित नहीं किया जायेगा।
9-कृत्रिम अंग
(क) उपचारी चिकित्सक की संस्तुति पर और चिकित्सालय के चिकित्सा अधीक्षक के अनुमोदन से, चाहे जिस भी पदनाम से वह जाना जाय, निम्नलिखित कृत्रिम अंग और साधित्र अनुमन्य किये जा सकते हैं:-
1. आर्थोपेडिक प्रोस्थीसिस हिप
2. प्रोस्थीसिस फार नी ज्वाइंट
3. सरवाइकल कालर्स
4. कार्डियाक पेस मेकर
5. कार्डियाक वाल्व
6. आर्टिफिशियल वोकल बाक्स
7. हियरिंग एड/कॉक्लियर इम्प्लान्ट
8. इन्ट्राऑक्यूलर लेन्स इम्प्लान्ट
9. थेराप्यूटिक कान्टेक्ट लेन्स
10. कम्प्लीट आर्टिफिशियल डेन्चर (सम्पूर्ण कृत्रिम दंतावली)
11. स्पेक्टेकल्स(चश्मे)(तीन वर्षों में एक बार से अनधिक)
12. नि:शक्त के उपयोग के लिए कृत्रिम अंग को शामिल करते हुए साधित्र
13. सरकार द्वारा अनुमोदित कोई अन्य साधित्र।
(ख) उपर्युक्त कृत्रिम अंगों और साधित्रों की आपूर्ति विशिष्टियों या निर्माण, नाम इत्यादि विनिर्दिष्ट करते हुए उपचारी चिकित्सक की लिखित सलाह पर की जायेगी।
10-संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान/किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय/सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों और सी.जी.एच.एस. निजी चिकित्सालयों में चिकित्सा उपचार
संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ, डा0 राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, गोमतीनगर लखनऊ, उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, सैफई, इटावा, किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ और ऐसे अन्य समान सरकारी वित्त पोषित संस्थानों और किसी सरकारी चिकित्सालय से सम्बद्ध चिकित्सालयों में बेनकदी उपचार उपलब्ध कराया जायेगा।
जबतक लाभार्थियों को स्वास्थ्य कार्ड जारी नहीं किया जाता है तबतक चिकित्सा विश्वविद्यालय/चिकित्सा महाविद्यालय/चिकित्सा संस्थान/स्वशासी सरकारी चिकित्सा महाविद्यालय और किसी सरकारी चिकित्सालय से सम्बद्ध चिकित्सालयों में अंतरंग उपचार के पश्चात चिकित्सा अधीक्षक द्वारा सत्यापित देयकों की पूर्ण प्रतिपूर्ति लाभार्थी के प्रशासकीय विभाग द्वारा की जायेगी। ऐसे देयकों का मुख्य चिकित्साधिकारी या किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा
तकनीकी रूप से परीक्षण किया जाना आवश्यक नहीं है।
परन्तु यह कि ऐसी औषधियां, जो खाद्य वस्तुओं, टानिक, टॉयलेटरीज आदि के रूप में उपयोग की जांय, देयकों में सम्मिलित नहीं की जायेंगी। लाभार्थी ऐसी व्ययों के लागत का वहन करेगा।
भाग-तीन
आपातकालीन स्थिति में और यात्रा के दौरान उपचार और विशिष्ट उपचार
11–तात्कालिक/आपातकालीन उपचार
किसी लाभार्थी को राज्य के भीतर या बाहर तात्कालिक/आपात स्थिति में या यात्रा पर किसी निजी चिकित्सालय या प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालय में उपचार प्राप्त करने की अनुमन्यता होगी। अंतःरोगी का उपचार आपात स्थिति में सी.जी.एच.एस. योजना के अधीन सूचीबद्ध निजी चिकित्सालयों में निःशुल्क होगा। प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालयों में उपचार प्राप्त करने के अलावा, यदि उपचार, राज्य के अन्य निजी चिकित्सालयों में कराया जाता है. तो उपचार का शुल्क, संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में यथाप्रचलित दर पर प्रतिपूर्णीय होगा और यदि रोग के उपचार की दर संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में उपलब्ध नहीं है तो प्रतिपूर्ति अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में प्रचलित दरों पर की जायेगी। यदि उपचार प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालयों से भिन्न राज्य के बाहर निजी चिकित्सालयों में कराया जाता है तो उपचार की दर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में प्रचलित दर पर प्रतिपूर्णीय होगी। प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालयों में उपचार होने की दशा में, उपचार की दर सी0जी0एच0एस0 की दरों पर प्रतिपूर्णीय होगी परन्तु
(क) उपचारी चिकित्सक तात्कालिक/आपातकालिक दशा प्रमाणित करे।
(ख) रोगी या उसके सम्बन्धी द्वारा कार्यालयाध्यक्ष को यथासंभव शीघ्र किन्तु उपचार प्रारम्भ होने के दिनांक से तीस दिनों के भीतर सूचित कर दिया जायेगा।
(ग) आपात स्थिति की दशा में एअर एम्बुलेन्स पर होने वाला व्यय भी प्रतिपूर्ति हेतु अनुमन्य होगा।
12-यात्रा पर उपचार
कार्यालय कार्य से या निजी कार्य के लिये यात्रा के दौरान अन्य राज्यों को गये सरकारी सेवक सम्बन्धित राज्य के सरकारी चिकित्सालय या प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालय में चिकित्सा परिचर्या और उपचार पाने के हकदार होंगे और उस पर उपगत हुआ वास्तविक व्यय पूर्णतया प्रतिपूरणीय होगा।
प्रतिबन्ध यह है कि प्रदेश के बाहर चिकित्सा महाविद्यालयों, संस्थानों या निजी चिकित्सालयों में कराये गये उपचार पर उपगत व्यय की प्रतिपूर्ति अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली की दरों पर होगी और प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालय में कराये गये उपचार की प्रतिपूर्ति, सी०जी०एच०एस० की दरों पर होगी।
कार्यालयीय यात्रा पर विदेश जाने वाले सरकारी सेवकों से यह प्रत्याशा की जाती है कि वे यात्रा एवं स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी प्राप्त कर लें, जिससे कि आवश्यकता पड़ने की दशा में विदेश यात्रा के दौरान उन्हें चिकित्सकीय उपचार का लाभ बीमा योजना के अंतर्गत मिल सके। यात्रा एवं स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी के बीमा प्रीमियम की प्रतिपूर्ति यात्रा भत्ता देयक में टिकट के साथ की जा सकती है किन्तु, किसी भी स्थिति में राज्य सरकार द्वारा पृथक से किसी चिकित्सा प्रतिपूर्ति को स्वीकृति नहीं दी जायेगी।
13-निजी चिकित्सालय में विशिष्ट उपचार
(क)- जटिल और गम्भीर बीमारियों के उपचार के लिए, जिनके लिए सरकारी चिकित्सालय या संदर्भित करने वाली संस्थाओं में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है, संदर्भित करने वाली संस्था के आचार्य या विभागाध्यक्ष या सरकारी जिला चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक या जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी से अन्यून श्रेणी के उपचारी चिकित्सक द्वारा विशिष्ट उपचार और चिकित्सा परिचर्या के लिए रोगी को ऐसे निजी चिकित्सालय या संस्था को जिसे राज्य अथवा केन्द्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हो, संदर्भित किया जा सकता है।
(ख) ऐसे निजी चिकित्सालय या संस्था में उपचार पर व्यय की प्रतिपूर्ति वास्तविक व्यय या राज्य के भीतर उपचार के लिए संजय गाँधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ की दरों या राज्य के बाहर हुए उपचार के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली की दरों तक, जो भी कम हो, सीमित होगी। प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालयों को संदर्भित मामलों पर उपगत व्यय की प्रतिपूर्ति सी०जी०एच०एस० की दरों पर की जाएगी।
(ग) ऐसे उपचार या जाँच जिनके लिए संजय गाँधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ या अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में सुविधा विद्यमान न हो, पर हुए व्ययों की प्रतिपूर्ति वास्तविक आधार पर की जायेगी, प्रतिबन्ध यह है कि उपचार देश के भीतर कराया गया हो।
14-मान्यता प्राप्त भारतीय चिकित्सा पद्धतियों द्वारा उपचार
सरकारी चिकित्सालय के बाहर होम्योपैथी, यूनानी या आयुर्वेद पद्धति या किसी अन्य विहित भारतीय चिकित्सा पद्धति द्वारा उपचार की प्रतिपूर्ति उस रूप में की जायेगी जैसी सरकार द्वारा विहित की जाय।
भाग-चार
सरकारी सेवकों के लिए चिकित्सा अग्रिम
15-चिकित्सा अग्रिम
(क) उपचार के लिए प्रतिपूर्ति के दावे को स्वीकृत करने वाला सक्षम प्राधिकारी, प्राक्कलित धनराशि के पंचानबे प्रतिशत तक अग्रिम स्वीकृत करने के लिए सक्षम होगा।
(ख) अग्रिम के लिए आवेदन परिशिष्ट “ख” में दिये गये विहित प्रारूप पर कार्यालयाध्यक्ष को प्रस्तुत किया जायेगा और उसके साथ उपचारी चिकित्सक द्वारा निर्गत तथा संस्था के प्रमुख/मुख्य चिकित्सा अधीक्षक/अधीक्षक/सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त चिकित्सालय के विभागाध्यक्ष द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित प्राक्कलन संलग्न किया जायेगा।
(ग-1) कार्यालयाध्यक्ष यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय करेगा कि स्वीकर्ता प्राधिकारी द्वारा यथाशीघ्र अग्रिम स्वीकृत कर दिया जाय और असाध्य या आकस्मिक या अप्रत्याशित रोगों के उपचार से सम्बन्धित मामलों में दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित चिकित्सालयों सहित प्राधिकृत संविदाकृत चिकित्सालयों से सी०जी०एच०एस० दरों पर प्राक्कलित प्राप्ति के पंचानबे प्रतिशत एक सप्ताह के भीतर चिकित्सा अग्रिम के रूप में स्वीकृत किया जायेगा और सम्बन्धित कर्मचारी या पेंशनभोगी के बचत खाते में जमा किया जायेगा।
(ग-2) उपचार के पूर्ण होने के दिनांक के पश्चात् सम्बन्धित कर्मचारी तीन महीनों के भीतर अपने चिकित्सा अग्रिम की धनराशि को अनिवार्य रूप से समायोजित करवायेगा।
(ग-3) कर्मचारियों तथा पेंशनभोगियों के लिए यथास्वीकृत अग्रिम के समायोजन हेतु अपनायी जाने वाली प्रक्रिया किसी कार्यकारी आदेश के माध्यम से सरकार द्वारा पृथक् रूप से निर्धारित की जायेगी।
(घ) कर्मचारी समायोजन/प्रतिपूर्ति दावा इसके उपभोग किये जाने के तत्काल पश्चात्, किन्तु उपचार समाप्त हो जाने के तीन माह अपश्चात्, प्रस्तुत करेगा।
(ङ) किसी रोग के निरन्तर उपचार की दशा में, परिचारक चिकित्सक की सलाह और संस्तुति पर, विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए द्वितीय अग्रिम की स्वीकृति इस शर्त के अधीन रहते हुए दी जा सकती है कि पूर्ववर्ती स्वीकृत अग्रिम को एक आंशिक दावा प्रस्तुत करके समायोजित किया गया है।
(च) प्रत्येक स्वीकर्ता प्राधिकारी परिशिष्ट “घ” में यथाविहित प्रारूप और रीति में एक रजिस्टर रखवायेगा।
(छ) आहरण एवं वितरण अधिकारी अग्रिम हेतु बिल (बीजक) पर प्रमाणक देगा कि स्वीकृत अग्रिम की ऐसे रजिस्टर में प्रविष्टि कर ली गयी है।
(ज) यदि अग्रिम के समायोजन के लिए चार महीनों के भीतर दावा नहीं प्रस्तुत किया जाता है तो अग्रिम की सम्पूर्ण धनराशि लाभार्थी के वेतन से मासिक किश्तों में काट ली जायेगी जो सकल वेतन के आधे से अधिक नहीं होगी।
(झ) यदि चिकित्सा अग्रिम स्वीकृत हो जाने के पश्चात उपचार नहीं प्रारम्भ होता है तो ऐसे अग्रिम की वापसी तीन महीनों में की जानी होगी और यदि ऐसे अग्रिम की वापसी तीन माह की अवधि के भीतर नहीं की जाती है तो दण्डात्मक ब्याज भी आरोपित किया जायेगा, जो भविष्य निधि पर लागू ब्याज की सामान्य दर से 2.5 प्रतिशत अधिक होगा।
भाग-पाँच
प्रतिपूर्ति
16-तीन महीनों के भीतर दावा
लाभार्थी द्वारा स्वीकर्ता प्राधिकारी को, यथाशक्य शीघ्र किन्तु उपचार की समाप्ति के पश्चात् तीन माह से अपश्चात् परिशिष्ट “ग” में दिये गये विहित प्रारूप में प्रतिपूर्ति दावा प्रस्तुत किया जायेगा।
बीजक के साथ संदर्भ-पत्र, उपचार परामर्श पत्रक और उपचारी चिकित्सक द्वारा विधिवत सत्यापित किये गये वाउचर और परिशिष्ट “ङ” में (बहिरंग उपचार) और परिशिष्ट “च” (अंतरंग उपचार) में अनिवार्यता प्रमाण-पत्र मूल रूप में प्रस्तुत किया जायेगा। विशेष परिस्थितियों में दावे को पुष्ट करने के लिए अन्य मूल दस्तावेज भी संलग्न किये जा सकते हैं। अपूर्ण दावों पर विचार नहीं किया जायेगा:
प्रतिबन्ध यह है कि किसी पेंशनभोगी का प्रतिपूर्ति दावा उस जिले के कार्यालयाध्यक्ष को प्रस्तुत किया जायेगा जहाँ से वह पेंशन आहरित कर रहा है। जहाँ ऐसा कोई कार्यालय न हो वहाँ सम्बन्धित जिले का जिला मजिस्ट्रेट इस प्रयोजनार्थ कार्यालयाध्यक्ष और विभागाध्यक्ष भी होगा।
17-तकनीकी परीक्षण प्राधिकारी
(क) स्वीकर्ता अधिकारी या पेंशनभोगी के मामले में कार्यालयाध्यक्ष दावा प्रस्तुत किये जाने के दिनांक से दस दिनों के भीतर तकनीकी परीक्षण के लिए सक्षम प्राधिकारी को भेजेगा। सम्बन्धित प्राधिकारी, सम्यक् तकनीकी परीक्षण करने के पश्चात् वास्तविक प्रतिपूरणीय धनराशि इंगित करते हुए उस दावे को पन्द्रह दिनों के भीतर, यथास्थिति, स्वीकर्ता प्राधिकारी या कार्यालयाध्यक्ष को वापस कर देगा।
(ख) जब तक कि कतिपय आपत्तियाँ न उठायी गयी हों और संसूचित न की गयी हों, स्वीकर्ता प्राधिकारी द्वारा तकनीकी परीक्षण रिपोर्ट प्राप्त होने के दिनांक से 01 माह के भीतर प्रतिपूर्ति आदेश जारी किया जायेगा और आहरण एवं वितरण अधिकारी अगले 15 दिनों के भीतर उसका वास्तविक भुगतान सुनिश्चित करेगा। पेंशनभोगी के मामले में, यदि कार्यालयाध्यक्ष स्वीकर्ता प्राधिकारी न हो तो, वह तकनीकी परीक्षण रिपोर्ट के साथ प्रतिपूर्ति दावे को सात दिनों के भीतर स्वीकर्ता प्राधिकारी को अग्रसारित कर देगा जो भुगतान के लिए उपर्युक्त समय-सारिणी का अनुसरण करेगा।
18-प्रतिपूर्ति के लिए अनिवार्य दस्तावेज
स्वीकर्ता प्राधिकारी द्वारा प्रतिपूर्ति की अनुमति तभी दी जायेगी जबकि परिशिष्ट “ग” में दिये गये विहित प्रारूप पर निम्नलिखित दस्तावेजों के साथ दावा प्रस्तुत किया जाए:
(क) उपचारी चिकित्सक द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित और चिकित्सालय के प्रभारी अधीक्षक, चाहे जिस भीनाम से जाना जाय, द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित अनिवार्यता प्रमाण-पत्र।
(ख) उपचारी चिकित्सक द्वारा विधिवत सत्यापित सभी बिलों, संदर्भ पत्र, प्रिस्क्रिप्शन पर्चों, और वाउचरों की मूल प्रतियाँ;
(ग) सक्षम प्राधिकारी द्वारा तकनीकी परीक्षण की रिपोर्ट।
(घ) विशेष परिस्थितियों में दावे को सिद्ध करने के लिए कोई अन्य दस्तावेज भी मूल रूप में संलग्न किये जा सकते हैं।
(ङ) अपूर्ण दावों पर विचार नहीं किया जायेगा।
19-तकनीकी परीक्षण के लिए सक्षम प्राधिकारी
(क) तकनीकी परीक्षण के लिए सक्षम अधिकारी निम्नवत् होंगे :-
| दावे की धनराशि | सक्षम प्राधिकारी |
| (एक) 50,000/- तक | उपचारी या संदर्भकर्ता सरकारी चिकित्सालय, आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथी सरकारी चिकित्सालय का प्रभारी चिकित्साधिकारी/अधीक्षक |
| (दो) 50,001/- से अधिक | उपचारी या संदर्भकर्ता मुख्य सरकारी चिकित्सालय का मुख्य चिकित्सा अधीक्षक/चिकित्सा अधीक्षक/मुख्य चिकित्सा अधिकारी/जिला होम्योपैथी चिकित्साधिकारी या क्षेत्रीय, आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारी। |
| (तीन) निजी चिकित्सालयों में विशिष्ट उपचार हेतु | नियम-13(क) में यथा उपबन्धित संदर्भकर्ता संस्था के चिकित्सा अधीक्षक/मुख्य चिकित्सा अधीक्षक/जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी या आचार्य या विभागाध्यक्ष से अन्यून श्रेणी के उपचारी चिकित्सक द्वारा। |
(ख) सक्षम प्राधिकारी दावे की विधि मान्यता/अनिवार्यता और अनुमन्यता का तकनीकी परीक्षण करेगा और प्रतिपूर्ति हेतु अनुमन्य धनराशि शब्दों और अंकों दोनों में संस्तुत करेगा।
20-स्वीकर्ता प्राधिकारी
उपचार हेतु प्रतिपूर्ति दावा स्वीकृत करने के लिये सक्षम प्राधिकारी निम्नवत् होंगे :-
कार्यरत/सेवानिवृत्त सरकारी सेवकों के लिए:-
| दावे की धनराशि | स्वीकर्ता प्राधिकारी |
| रू0 2,00,000/- तक | कार्यालयाध्यक्ष |
| रू0 2,00,000/- से अधिक रू0 5,00,000/- तक | विभागाध्यक्ष |
| रू0 5,00,000/- से रू0 10,00,000/- तक | सरकार में प्रशासकीय विभाग |
| रू0 10,00,000/- से अधिक | वित्त विभाग के पूर्वानुमोदन और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की संस्तुति के पश्चात सरकार में प्रशासकीय विभाग। |
21-व्यय का कोषागार “शीर्ष”
प्रतिपूर्ति की धनराशि उसी “शीर्ष” से आहरित की जायेगी जिससे सामान्यतया वेतन, भत्ते और पेंशन आदि आहरित किये जाते हैं।
भाग-छः
प्रकीर्ण
22-यात्रा और सहचर
(क) यदि कोई प्राधिकृत चिकित्सा परिचारक किसी रोगी को उच्चतर/विशिष्ट उपचार के लिए, जिसके लिए जिला/राज्य में सुविधा उपलब्ध नहीं है, किसी चिकित्सालय को संदर्भित करता है तो कार्यालयाध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत चिकित्सा परिचारक की विशिष्ट लिखित सलाह पर ऐसा उपचार कराने के लिए यात्रा की अनुमति दी जा सकती है।
(ख) बीमारी की गम्भीरता पर विचार करते हुए यदि प्राधिकृत चिकित्सा परिचारक लिखित में यह संस्तुति करता है कि रोगी को किसी परिचारक द्वारा अनुरक्षित किया जाना है, तो कार्यालयाध्यक्ष द्वारा नाम सहित किसी परिचारक के लिए अनुमति दी जा सकती है जो सामान्यतः रोगी का सम्बन्धी होगा।
(ग) रोगी और परिचारक, यदि कोई हो, अपनी सरकारी यात्रा के हकदारी की सीमा तक अपने निवास से उपचार के स्थान तक निकटतम रेल मार्ग से जाने और वापस आने की ऐसी यात्रा हेतु यात्रा भत्ता पाने का हकदार होगा। तथापि, कोई दैनिक भत्ता अनुमन्य नहीं होगा।
(घ) जटिल बीमारी की दशा में, प्राधिकृत चिकित्सा परिचारक की लिखित संस्तुति पर सरकार वायुयान द्वारा यात्रा की अनुमति दे सकती है। तथापि, ऐसी यात्रा पर कोई दैनिक भत्ता अनुमन्य नहीं होगा।
23-समय-सीमा
सामान्यतया दावा तीन माह के भीतर प्रस्तुत कर दिया जाना चाहिए अन्यथा विभागीय सचिव का अनुमोदन अनिवार्य होगा जो मामले के गुणदोष के आधार पर दावे की प्रतिपूर्ति का विनिश्चय करेगा।
24-अखिल भारतीय सेवा के सदस्य
यह नियमावली अखिल भारतीय सेवा के सदस्यों पर उन मामलों में लागू होगी जहाँ अखिल भारतीय सेवा (चिकित्सा परिचर्या) नियमावली, 1954 के प्रावधान इस नियमावली से निम्नतर हैं।
25-बाह्य सेवा
यदि कोई सरकारी सेवक बाह्य सेवा/प्रतिनियुक्ति पर सेवारत हो तो उसे इस नियमावली के अधीन अनुमन्य से निम्नतर चिकित्सा सुविधा नहीं प्राप्त होगी और चिकित्सा परिचर्या तथा उपचार पर हुआ व्यय बाह्य नियोक्ता द्वारा वहन किया जायेगा और पैतृक विभाग द्वारा नहीं किया जायेगा।
26-निरसन और अपवाद
समय-समय पर यथासंशोधित उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा परिचर्या) नियमावली, 1946 और इस संबंध में निर्गत किये गये सभी सरकारी आदेश निरसित हो जायेंगे। तथापि, प्रतिपूर्ति के लिए हकदारी उनसे कम नहीं होगी जो इस नियमावली के प्रारम्भ के पूर्व अनुमन्य थी।
27-कठिनाई का निराकरण
यदि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (चिकित्सा परिचर्या) नियमावली, 2011 के उपबन्धों के प्रवर्तन में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राज्य सरकार गजट में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबन्ध कर सकती है जो इस नियमावली से असंगत न हों और कठिनाई दूर करने के लिए आवश्यक और समीचीन प्रतीत हों।
28-निर्वचन और शिथिलीकरण
(क) यदि इस नियमावली के निर्वचन के संबंध में कोई शंका उत्पन्न होती है तो उसे सरकार को निर्दिष्ट किया जायेगा, जिसका उस पर निर्णय अन्तिम होगा।
(ख) जहाँ राज्य सरकार का समाधान हो जाए कि चिकित्सा परिचर्या की शर्तों को विनियमित करने वाले किसी नियम या उसके अधीन निर्गत आदेश से किसी विशिष्ट मामले में कोई असम्यक् कठिनाई उत्पन्न होती है, वहाँ वह, उस मामले में लागू नियम या आदेश में किसी बात के होते हुए भी उस नियम या आदेश की अपेक्षाओं को उस सीमा तक और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए आदेश द्वारा वह अभिमुक्त या शिथिल कर सकती है जैसा मामले के न्यायोचित और साम्यपूर्ण रीति से निस्तारण के लिए आवश्यक समझे।